गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

संगीत से रोशन कर रहे दुनिया

इब्राहीम अली कक्षा में छात्राओं के साथ
प्रारब्ध ने रोशनी से मोहताज कर जिनके जीवन में अंधेरा भर दिया वे जब अपने साथ-साथ दूसरों के जीवन में रंग भरते हैं तो वे न सिर्फ नियति को चुनौती देते हैं बल्कि समाज को भी एक नई राह बताते हैं। ऐसे ही जीवट लोग उज्जैन में अनुकरणीय उदाहरण पेश कर रहे हैं जिनकी आँखों से रोशनी तो छिन गई लेकिन उन्होंने संगीत जगत को रोशन करने का महती कार्य अपने हाथ में लिया।
उज्जैन के कालिदास कन्या महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक (संगीत)के पद पर कार्य कर रहे ४८ वर्षीय  डॉ.इब्राहीम अली बोहरा समाज से ताल्लुक रखते हैं और उनके परिवार का दूर-दूर तक संगीत से कोई वास्ता नहीं था। जब उनके चिकित्सक पिता डॉ.कासिम अली ने पाया कि उनका पुत्र जन्म से ही आँखों की ऐसी बीमारी से पीड़ित है जिससे वह धीरे-धीरे अपनी पूरी रोशनी खो देगा तो उन्होंने उसे संगीत जगत में जाने के लिए प्रेरित किया। नतीजा यह कि डॉ.इब्राहीम अली आज न सिर्फ संगीत में पीएच.डी. कर चुके हैं बल्कि दो विद्यार्थियों को पीएच.डी.करा चुके हैं और पाँच विद्यार्थी उनके मार्गदशन में पीएच.डी.कर रहे हैं। डॉ.कासिम अली कहते हैं ''मैंने बचपन में ही झूठी दिलासा देने के स्थान पर अपने बेटे को स्पष्ट बताया कि तुम्हारे सामने चुनौती है और तुम्हें इससे जूझना होगा। जब उसने संगीत की ओर अपना रुझान जाहिर किया तो मैंने उसे संगीत को बतौर कैरियर अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।'' उज्जैन स्थित संगीत महाविद्यालय में १९७८ में प्रवेश लेकर डॉ.इब्राहीम अली ने सुर साधना आरंभ किया और १९८१ में महाविद्यालय के श्रेष्ठ विद्यार्थी आंके गए। उन्होंने १९८५ में इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से कंठ संगीत में स्नातकोत्तर उपाधि मंच प्रदर्शन  में विशेष योग्यता के साथ प्राप्त की। हालांकि वे सुगम संगीत के क्षेत्र में जाना चाहते थे और उसमें ही निष्णात होने के लिए शास्त्रीय संगीत सीख रहे थे लेकिन इस दौरान ही उनका झुकाव शास्त्रीय संगीत की ओर हो गया। वे उस्ताद अमीर खाँ की गायकी से प्रभावित थे इसलिए उनकी ही परंपरा के गायक पद्‌मश्री गोकुलोत्सवजी महाराज के शिष्य बन गए। सीखने की ललक इतनी कि सप्ताह में दो दिन उज्जैन से ५६ किमी दूर इन्दौर जाते थे। डॉ.इब्राहीम अली बताते हैं ''१९८८ में संगीत महाविद्यालय में ही पढ़ाने लगा, कई आयोजनों में गायन भी करने लगा और साथ ही साथ शोध कार्य भी आरंभ कर दिया।'' १९९३ में खयात संगीत शास्त्री डॉ.प्यारेलाल श्रीमाल के मार्गदर्शन  में उन्होंने पद्‌मभूषण उस्ताद अमीर खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पीएच.डी.की और फिर म.प्र.लोक सेवा आयोग से चयनित होकर कालिदास कन्या महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक नियुक्त किए गए। डॉ.श्रीमाल कहते हैं ''इब्राहीम अली में मैंने विलक्षण प्रतिभा देखी और साथ ही साथ काफी मेहनती व्यक्ति भी। उनकी दृष्टिहीनता के कारण आरंभ में मुझे झिझक थी लेकिन उनकी लगन देखकर मैं उन्हें मार्गदर्शन  देने को तैयार हो गया।'' डॉ.अली कहते हैं ''मेरा आरंभ से ही यह मानना रहा है कि शारीरिक चुनौती का सामना करने के लिए अतिरिक्त प्रयास आवश्यक हैं और वैकल्पिक साधनों से इस पर काबू पाया जा सकता है।'' इसीलिए उन्होंने शुरु से ही वैकल्पिक साधन अपनाते हुए पहले ब्रेल लिपि सीखी,विक्रम विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में अंग्रेजी और संगीत में विशेष योग्यता के साथ बीए किया और २००४ से स्क्रीन रीडिंग साफ्‌टवेयर की मदद से वे कम्प्यूटर का बखूबी प्रयोग करते हैं। २००५ में उन्हें केन्द्र सरकार के सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से अत्यन्त कुशल विकलांग कर्मचारी के रुप में राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुआ। उनकी एक विद्यार्थी पवित्रा कुशवाह कहती हैं ''वे संगीत ही नहीं सभी विषयों पर,सभी मुद्‌दों पर मार्गदर्शन देते हैं।'' नतीजा यह कि आज वे अनेक दृष्टिहीनों के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुके हैं।


अर्चना मिश्र
डॉ.अली से प्रेरणा पाकर ही ४४ वर्षीया कला साधिका अर्चना मिश्र उनसे कम्प्यूटर चलाना सीख रही हैं जो डॉ.अली की तरह ही दृष्टिहीनता की शिकार हैं। हालांकि जन्म से उनकी केवल एक आँख कमजोर थी और चिकित्सकों का कहना था कि १३-१४ वर्ष की अवस्था में ऑपरेशन कर यह ठीक की जा सकती है लेकिन दुर्भाग्य से उनकी दूसरी आँख की रोशनी भी जाती रही। जुझारू अर्चना ने नियति के समक्ष हार नहीं मानी और पहले एक वर्ष कथक का अभ्यास किया फिर १९८५ से गायन की ओर मुड़ गईं। इससे ही आज वे अपने पैरों पर खड़ी  हैं। प्रयाग संगीत समिति से पहले कंठ संगीत और फिर तबले में प्रभाकर करने के उपरांत उन्होंने संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ  से गायन में प्रावीण्य सूची में दूसरा स्थान पाते हुए स्नातक किया, फिर स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। ब्रेल लिपि सीखकर इंदिरा गांधी खुला विश्वविद्यालय से बीए किया और एक विद्यालय में संगीत शिक्षिका बन गईं। १९९९ में मप्र शासन के सामाजिक न्याय विभाग के अंतर्गत कलापथक दल में उनका चयन हो गया और अध्यापन छूट गया लेकिन आज भी जब-जब अन्य शहरों के दौरों के बीच उन्हें समय मिलता है वे विद्यार्थियों को मार्गदर्शन देने को उत्सुक रहती हैं। अर्चना अपने स्वर्गीय पिता कमलेश  मिश्र को अपनी उपलब्धियों का श्रेय देते हुए कहती हैं '' मेरी पहली पदस्थापना ६० किमी दूर शाजापुर में हुई थी और मैं रोज आना-जाना करती थी। तब पिताजी ने मुझमें आत्मविश्वास भरा और माँ श्रीमती इन्दु मिश्र ने समाज से लडना सीखाया।'' उनके भाई सुदीप मिश्र कहते हैं ''वे नई चुनौतियों को पसंद करती हैं और जब कोई उन्हें विकलांग मानकर हतोत्साहित करता है और उनकी क्षमताओं पर संदेह जाहिर करता है तो वे अपने कार्य से माकूल जवाब देती हैं।''
सुनील दुबे
लोगों द्वारा हतोत्साहित किए जाने पर सभी दृष्टिहीन अर्चना जैसा जवाब नहीं दे पाते। ३० वर्षीय दृष्टिहीन गोपाल रईकवाल कहते हैं ''मुख्य समस्या यह मानसिकता है कि  जो कार्य कई सामान्य लोग नहीं कर सकते उस कार्य को कोई दृष्टिहीन कैसे कर सकता है।'' कई बार निराश  हो जाने वाले मूल रुप से सीहोर के रहवासी जन्मांध रईकवाल एक मजदूर पिता की संतान हैं। उन्होंने इन्दौर स्थित दृष्टिहीन बच्चों के विद्यालय में संगीत सीखना आरंभ किया और इस कदर रुचि बढ़ी कि सीहोर लौटने पर गुरु ढूंढने लगे। मुबारक खां के रुप में उन्हें उस्ताद मिले और उनसे सीखते हुए रईकवाल ने प्रयाग संगीत समिति से प्रभाकर किया। वर्ष २००६ में प्रसिद्ध मैहर बेण्ड में नौकरी मिली और २००९ में उज्जैन के माधव संगीत महाविद्यालय में आ गए। अध्यापन के साथ-साथ वे संगीत में स्नातकोत्तर की तैयारी कर रहे हैं। खयात शास्त्रीय गायक पं.सुधाकर देवले से वे इन दिनों गायन की बारीकियां सीख रहे हैं। पं.देवले कहते हैं ''शारीरिक चुनौतियों के बावजूद ये कक्षा में नियमित आते हैं और लगन से सीखते हैं। हालांकि मैं जानबूझकर अन्य विद्यार्थियों में और इनमें कोई भेद नहीं करता क्योंकि सहानुभूति के पात्र बनाने से इनका आत्मविश्वास कम होता जाएगा।''राजनीति शास्त्र में एमए कर चुके रईकवाल 'ऐतबार सीहोरी' के नाम से गजल भी लिखते हैं और स्वयं ही धुन बनाकर गाते भी हैं।
पं.देवले से ही गायन सीखने वाले ५० वर्षीय सुनील दुबे शासकीय कन्या विद्यालय में तबले के शिक्षक  हैं और बचपन में टेबल और रसोई के डिब्बे बजाने के कारण उनके उप पंजीयक पिता ने उन्हें खयात तबला वादक और संगीत महाविद्यालय में शिक्षक पं नृसिंह दास महन्त के पास भेजा। तब सुनील की आँखें सही-सलामत थीं। संगीत महाविद्यालय से १९८३ में तबले में मध्यमा के बाद वे नौकरी में आकर तबला शिक्षक हो गए और तालिम वहीं रुक गई। उसके बाद नियति ने अपना खेल दिखाया और उनकी दोनों आँखों की दृष्टि धीरे-धीरे चली गई। पुनः अध्ययन आरंभ करते हुए उन्होंने प्रयाग संगीत समिति से तबले में प्रभाकर किया और फिर कंठ संगीत की ओर आकर्षित हुए। अपनी पत्नी कल्याणी दुबे द्वारा सहयोग और प्रोत्साहन दिए जाने के बाद मानसिंह तोमर संगीत विश्वविद्यालय ग्वालियर से गायन में ही संगीत कोविद(स्नातकोत्तर के समकक्ष) किया। पं.देवले कहते हैं '' आर्थिक चुनौतियां होते हुए भी ऑटो रिकशा  द्वारा प्रतिदिन कक्षा में आना संगीत के प्रति समर्पण ही सिद्ध करता है।''

ऐसा ही समर्पण २९ वर्षीया खेमलता मर्सकाले में दिखाई देता है जो जन्म के चार-पांच वर्षों बाद अपनी दृष्टि खो बैठी। दृष्टिहीनों के संस्थान में संगीत के प्रति रुचि हुई और जबलपुर के एक कारखाने में सुरक्षाकर्मी रहे पिता से प्रोत्साहन मिलने पर खेमलता ने इसे ही भविष्य बना लिया। खेमलता संगीत में स्नातक करने के बाद उज्जैन के माधव संगीत महाविद्यालय में अध्यापन के लिए चुन ली गईं और अब वे साथ-साथ स्नातकोत्तर हेतु अध्ययन भी कर रही हैं।
ये सभी दृष्टिहीन अकेल आने-जाने में अक्षमता जैसी अनेक परेशानियों के बावजूद अपने कार्य से समाज के सामने उदाहरण पेश कर रहे हैं लेकिन इनकी शिकाय त है कि समाज इनकी काबिलियत पर संदेह तो करता ही है। डॉ.अली कहते हैं ''हम आत्मविश्वास से लबरेज हैं फिर भी समाज हमें कमतर आंकता है,हमारी कमी को हमारी पहचान मानता है न कि हमारे सकारात्मक पक्ष को। वह हम पर विश्वास देर से करता है और हमें अपने पक्ष में माहौल बनाने में वक्त लगता है। इससे कई बार निराशा होती है। '' इनमें महिलाओं के सामने तो दोहरी चुनौती होती है,एक दृष्टिहीनता और दूसरी महिला होना लेकिन जैसा कि अर्चना मिश्र कहती हैं ''हतोत्साहित करने वाले हैं तो सहायता करने वाले भी बहुत हैं।'' समाज के एक तबके के इसी समर्थन से ये सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं और अपने जैसे अन्य दृष्टिहीनों में नया उत्साह भर रहे हैं।

उक्त आलेख सम्पादित होकर इंडिया टुडे के १९ जनवरी २०११ के अंक में प्रकाशित हुआ है...

शनिवार, 27 नवंबर 2010

सत्ता पक्ष से नजदीकी अलग चीज है लेकिन पाठकों के प्रति ईमानदारी भी कुछ होती है....

आज ही खुशवंत सिंह जी का लेख पढ़ा.सिद्धार्थ शंकर रे को याद करने के साथ ही उन्होंने कुछ बातें आपातकाल के बारे में लिखी है.....आप भी पढ़ें...."उसी दौरान श्रीमती गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी और विपक्ष के सभी नेताओं को जेल में डाल दिया।
लोकतांत्रिक तकाजों को निलंबित करने के लिए जरूरी कानूनी मसौदा तैयार करने में सिद्धार्थ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जयप्रकाश नारायण सहित विपक्ष के नेता विरोध प्रदर्शन के लिए लोकतांत्रिक सीमाओं को लांघ चुके थे। देश की अखंडता दांव पर थी।"
खुशवंत जी की सहानुभूति श्रीमती गांधी और रे के साथ दिखाई देती है और वे आपातकाल के समर्थक नज़र आते हैं. वे ऐसे कानून का मसौदा बनाने में रे की महत्वपूर्ण भूमिका का जिक्र करते हैं जो लोकतंत्र पर प्रहार करने वाला था.इस  कार्य के लिए कहीं भी नकारात्मक टिप्पणी वे जरूरी नहीं समझते.वहीँ वे जेपी और विपक्ष के अन्य नेताओं को लोकतान्त्रिक सीमाएं लांघने का दोषी ठहराते हैं और उनके विरोध को देश की अखंडता के लिए खतरा बताते हैं.
जिस आपातकाल के विरोध में अखबार काले पन्ने निकाल रहे थे,जिसे लोकतंत्र पर आक्रमण समझा जाता है और जिसके कारण श्रीमती गाँधी की बुरी तरह हार हुई....जो आम जनता की संवेदना और भावनाओं से जुड़ा मुद्दा समझा जाता है.उस पर एक वरिष्ठ पत्रकार की टिप्पणी व्यक्तिगत आग्रह-दुराग्रह से भरी नज़र आती है..कहीं से भी इसे तटस्थ नजरिया नहीं माना जा सकता...वे आगे लिखते हैं ...
"जनता द्वारा चुने गए विधायकों को विधानसभा जाने से रोका जा रहा था, लोगों से कहा जा रहा था कि वे टैक्स चुकाना बंद कर दें, पुलिस और लोगों को विद्रोह के लिए उकसाया जा रहा था। अराजकता के हालात थे। हड़तालें हो रही थीं। स्कूल-कॉलेज बंद थे। उग्र जुलूस कारों के शीशे और दुकानों की खिड़कियां तोड़कर आगे बढ़े चले जा रहे थे।

लेकिन आपातकाल लगाए जाने के बाद रातोंरात सब शांत हो गया। कानून व्यवस्था फिर बहाल हो गई। स्कूल-कॉलेज खुल गए। ट्रेनें समय से दौड़ने लगीं। सभी ने राहत की सांस ली।"
आन्दोलनों को कुचलने के लिए ही आपातकाल का प्रयोग किया गया और नेताओं को जेल में ठूंस दिया गया..इसे खुशवंत जी रातोंरात सब शांत होना कहते हैं.."सभी ने राहत की सांस ली"लिखते हुए वे यह भूल जाते हैं कि "सभी" का अर्थ आम जनता कतई नहीं थी..हालाँकि वे एक वाक्य आपातकाल के विरोध में भी लिखते हैं लेकिन किस तरह...देखिये."लेकिन जब श्रीमती गांधी और उनके परिवार के सदस्यों खासतौर पर मेनका गांधी, उनके माता-पिता और उनके पति द्वारा व्यक्तिगत हिसाब बराबर करने के लिए आपातकाल का दुरुपयोग किया जाने लगा, तब उसकी छवि खराब हुई। सिद्धार्थ भी मुझसे सहमत थे।"
आपातकाल के दुरूपयोग से ख़राब उसकी छवि के बहाने उनका निशाना मेनका गाँधी और उनके परिजन ज्यादा दिखाई देते हैं..वे क्यों संजय गाँधी का सीधा नाम दुरूपयोग करने वालों में नहीं लेते,देखें वे लिखते हैं
  "जब मुझे द इलस्ट्रेटेड वीकली से निकाल बाहर कर दिया गया, तब संजय गांधी मेरे लिए एक युवा मददगार बनकर आए।

उन्होंने राज्यसभा सदस्य के रूप में मेरा मनोनयन किया और मुझे द हिंदुस्तान टाइम्स का संपादक बना दिया"
 ये पढ़कर खुशवंत जी  की छवि एक गैरतमंद पत्रकार की कतई नहीं बनती..मुझे याद है दीवान बीरेन्द्र नाथ के लेख जिसमें उन्होंने जिक्र किया है कि श्रीमती गाँधी उनकी बहुत इज्ज़त करती थीं,उनके सम्बन्ध भी मधुर थे लेकिन आपातकाल को लेकर,उनके तानाशाही रवैये को लेकर उन्होंने कोई लिहाज़ नहीं किया और अपना विरोध प्रकट किया..सत्ता पक्ष से नजदीकी,सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध अलग चीज है लेकिन अपना कर्त्तव्य,पाठकों के प्रति ईमानदारी,देश की आम जनता के लिए प्रतिबद्ध ता भी कुछ होती है....   



   

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

पाखी के नवम्बर अंक में प्रकाशित विमल कुमार जी की एक कविता विशेषकर फेसबुक दोस्तों के लिए

                                               फेसबुक का नाम बदल दो

                                                 फेसबुक पर
                                                 सबकी तस्वीरें थीं
                                                 पर उस बुढ़िया की नहीं थी
                                                 जो सड़क के किनारे
                                                 भीख माँग रही थी
                                                 नहीं थी उस बच्चे की तस्वीर
                                                 जो एक होटल में अभी भी काम करता था
                                                 शिक्षा का अधिकार लागू हो जाने के बाद
                                                 तस्वीरें नहीं थीं
                                                 आत्महत्या करते किसानों की
                                                 फेसबुक
                                                 अपने समय की
                                                 एक झूठी किताब थी
                                                 किताबें जो सच नहीं कहतीं 
                                                 वे कहीं से किताबें नहीं कही जा सकतीं
                                                बेहतर है,
                                                तुम फेसबुक का नाम बदल दो.

  http://www.facebook.com/home.php?#!/profile.php?id=100000821644237

रविवार, 17 अक्टूबर 2010

"ye vo sahar to nahin"

सभी को दशहरे की ढेर सारी शुभकामनाएँ ...पंकज जी के उपन्यास "ये वो सहर तो नहीं" पर कुछ और लिखना था लेकिन बहुत व्यस्तता रही..जल्दी ही आगे लिखूंगा...वैसे एक बात मन में आई...मैंने पहले लिखा है कि सभी आई.ए.एस. और पत्रकार साथियों को ये उपन्यास पढना चाहिए..जब आई.ए.एस.साथी ये उपन्यास पढेंगे तो जनरल ह्यूरोज से अपनी तुलना स्वीकार नहीं कर सकेंगे.निश्चित रूप से इसे अतिरंजना समझा जाएगा.वैसे भी मानवेन्द्र बगैर किसी आधार के कार्रवाई नहीं करता है,भले ही प्रताड़ना के लिए बहाना ढूंढता हो लेकिन नियम का उल्लंघन पाए जाने पर ही अपना रंग दिखाता है.जैसे अपना स्वयं का मकान होने के बावजूद पत्रकार द्वारा सरकारी आवास का इस्तेमाल और वह भी वकालत के पेशे के लिए न कि पत्रकारिता के लिए. इस तथ्य के कारण ही जिलाधीश की हिम्मत कार्रवाई के लिए होती है.. जब जनरल ह्यूरोज से जिलाधीश की तुलना की गयी है तो स्वाभाविक है कि पीड़ित विद्रोही सिपाहियों के समकक्ष पीड़ित पत्रकार को खड़ा किया गया है...लेकिन सरोकारों को देखें तो ये पत्रकार न तो विद्रोही है और न ही सच्चाई का समर्थक ..अन्याय का विरोधी तो कतई नहीं...उसकी लड़ाई व्यक्तिगत है,बदले की भावना से भरी है.वह अपनी लड़ाई को समाज की लड़ाई में बदलने की कुवत भी नहीं रखता है..क्योंकि वह स्वार्थी है,वह सिद्धांतों को परे रखने वालों में से है..कम से कम उपन्यास में किये गए चरित्र चित्रण से तो यही लगता है इसलिए वह सहानुभूति का पात्र भी नहीं बन पाता.. 
फिर भी दो विभिन्न कालखंडों को समानांतर रखने का कौशल पंकज सुबीर ने साधा है..यह इस मायने में भी प्रशंसनीय है कि पंकज जी ने स्वयं कमलेश्वर की "राजा निरबंसिया" का जिक्र किया है जो एक कहानी है और उसमें इसी तरह दो अलग कालखंडों की कथा एक साथ चलती है..कहानी होने के कारण ये अल्पावधि में पढ़ी जा सकने वाली रचना है और निरंतरता टूटने का कोई डर नहीं रहता जबकि पंकज जी ने उपन्यास में ऐसा प्रयोग कर किंचित कठिन कार्य किया है..यही वजह है कि पत्रकार और जिलाधीश के टकराव की मामूली-सी कथा इतिहास को समानांतर रखने के कारण असाधारण बन गयी..असाधारण इसलिए कि कमलेश्वर जी ने राजा निरबंसिया और रानी को कम स्पेस दिया है और वास्तव में वह कहानी जगपति और चंदा की है,यही उस कहानी  की जरुरत थी जबकि पंकज जी ने १८५७ की क्रांति को पर्याप्त जगह दी है और सिर्फ १८५७ की कहानी (पंकज जी के अनुसार इतिहास में कहीं नहीं पाई जाती)को पढ़ा जाए तो वह एक रोचक कथा होगी.

रविवार, 10 अक्टूबर 2010

ये वो सहर तो नहीं

हिंदी कथा जगत में अपना ख़ास मुकाम बना चुके युवा रचनाकार पंकज सुबीर का प्रथम उपन्यास--ये वो सहर तो नहीं --ज्ञानपीठ से आ गया है.इस उपन्यास के लिए पंकज जी को ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार प्राप्त हुआ. साहित्य जगत से जुड़े लोग तो पढेंगे ही लेकिन पत्रकार साथियों तथा आई.ए.एस अधिकारियों को इसे जरूर पढना चाहिए.पंकज भाई ने व्यंग्य का तड़का लगते हुए शिवपालगंज की याद दिला दी.देखें किस खूबी से एक शहर नहीं देश के अधिकांश हिस्से की बात कही है--विरोध यहाँ की जनता कभी भी नहीं करती है.नल में पानी नहीं आता है तो ट्यूबवेल लगवा लेती है.वो भी सूख जाता है तो हेंडपंप से पानी भर लाती है.हेंडपंप भी नहीं मिलता तो टेंकर से पानी खरीद कर डलवा लेती है लेकिन कभी किसी से ये नहीं पूछती कि हुजूर,हमारे हिस्से का पानी गया कहाँ ?


अधिकाँश लोग पीपली लाइव को याद करते हुए इस बात से सहमत होंगे... ये नए ज़माने की इलेक्ट्रोनिक मीडिया की पत्रकारिता है.उसमें आप नहीं काम करते,आपका कैमरा करता है.प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत बनी किसी भी सड़क की वीडिओ शूटिंग कर लाये.सड़क के गड्ढे और उसकी दुर्दशा पर चार ग्रामीणों की बाईट ले ली.उसके बाद वहीं खड़े होकर एक पीटूसी किया और वर्शन लेने पहुँच गए सम्बन्धित अधिकारी के पास ! यह जो सड़क बनने के कुछ ही दिनों बाद इतनी ख़राब हो गयी,इसको लेकर आप क्या एक्शन ले रहे हैं.बातों ही बातों में उस अधिकारी को वीडिओ फूटेज दिखा दिए...जैसे ही आप अधिकारी के पास से उठेंगे वह तुरंत ठेकेदार को फोन लगाकर सब कुछ बता देगा.उसके बाद होगा यह कि वह ग्रामीण,वह सड़क टीवी के पर्दे पर आने की हसरत दिल में लिए ही रह जाएँगे.चैनल पत्रकार का सड़क के गड्ढे देखने का नजरिया क्रांतिकारी रूप से बदल चुका होगा.

पंकज जी ने सीधे सपाट शब्दों में सच्चाई बयां कर दी...इस समय तक प्रदेश स्तर पर ही करीब ३० समाचार चैनल कार्य कर रहे थे.कुछ तो ऐसे थे कि जिनके कैमरामेन और संवाददाता चैनल का लोगो लगे माइक के साथ फील्ड में तो खूब दिखाई देते थे,लेकिन इन समाचार चैनलों को आजतक किसी ने टीवी पर नहीं देखा था....इन समाचार चैनलों ने बड़े स्तर पर प्रदेश भर में अपने संवाददाताओं की नियुक्ति कर रखी थी.नियुक्ति के लिए दो शर्तें थी.पहली तो यह कि संवाददाता के पास अपना स्वयं का कैमरा तथा कैमरामेन हो.दूसरी महत्वपूर्ण शर्त यह थी कि संवाददाता को हर माह दस हज़ार रुपये के विज्ञापन अपने चैनल को देने होते थे.इसमें से भी विज्ञापन शब्द हटा दें तो दस हज़ार रुपये हर माह चैनल के ऑफिस में जमा करवाने होते थे.प्रदेश के कई आबकारी ठेकेदारों,माफियाओं,नेताओं ने इसी स्कीम के तहत किसी न किसी चैनल की आईडी ले रखी थी.

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

सदैव छलनी किया है मुझे व्यवस्था के क्रूर पंजों ने .....